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अगर U C C कानून देश में लागू हो गया गया तो ,, विपक्ष की भेस गई पानी में

Vinod meghwani एक खबर (Vinod meghwani )

आप समान नागरिक संहिता पर 22 वे विधि आयोग को इस पर सुझाव भेज सकते है,,,,,http://legalaffairs.gov.in/law_commission/ucc/22वें विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर आम जनता और धार्मिक संगठनों से राय मांगी है. ऐसे में जानते हैं कि समान

नागरिक संहिता लागू करने में क्या-क्या चुनौतियां हो सकती है 
समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग ने सुझाव मांगे हैं. (समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग ने सुझाव मांगे हैं. 


अयोध्या में राम मंदिर बन रहा है. कश्मीर से धारा 370 भी हट चुकी है. तो क्या अब बीजेपी समान नागरिक संहिता लागू करने का अपना तीसरा वादा पूरा करने की तैयारी में जुट गई है. 

दरअसल, 22वें विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर आम जनता से विचार-विमर्श की प्रक्रिया शुरू कर दी है. आयोग ने जनता, सार्वजनिक संस्थान और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों से एक महीने में इस मुद्दे पर राय मांगी है.

इससे पहले मार्च 2018 में 21वें विधि आयोग ने विचार-विमर्श के बाद दी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि फिलहाल देश को समान नागरिक संहिता की जरूरत नहीं है. लेकिन पारिवारिक कानून यानी फैमिली लॉ में सुधार की सिफारिश जरूर की थी.

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21वें विधि आयोग की रिपोर्ट के पांच साल बाद 22वें विधि आयोग ने विचार-विमर्श की प्रक्रिया शुरू की है. आयोग ने नोटिफिकेशन जारी समान नागरिक संहिता पर बड़े पैमाने पर जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों से राय मांगी है.

कैसे दे सकते हैं अपनी राय?

- विधि आयोग ने अपनी राय देने के लिए 30 दिन का समय दिया है. अपने सुझाव या राय देने की आखिरी तारीख 14 जुलाई है. 


- अपनी राय तीन तरह से दे सकते हैं. पहला- विधि आयोग की वेबसाइट के जरिए. दूसरा- ईमेल के जरिए. और तीसरा- पोस्ट के जरिए.

- ऑनलाइन सुझाव legalaffairs.gov.in/law_commission/ucc/ पर जाकर दे सकते हैं. यहां एक पेज खुलेगा. इसमें अपनी सारी डिटेल भरकर तीन हजार शब्दों में अपने सुझाव या राय दे सकते हैं.

- इसके अलावा आप चाहें तो अपनी राय या सुझाव को membersecretary-lci@gov.in पर ईमेल भी कर सकते हैं.

- तीसरा तरीका ये है कि आप अपने सुझाव या राय लिखें और पोस्ट के जरिए विधि आयोग तक भेज दें. इसका पता है- मेंबर सेक्रेटरी, लॉ कमिशन ऑफ इंडिया, चौथा फ्लोर, लोकनायक भवन, खान मार्केट, नई दिल्ली- 110003.

- 14 जुलाई तक राय और सुझाव आने के बाद विधि आयोग कुछ लोगों या फिर संगठनों के प्रतिनिधियों को भी चर्चा के लिए बुला सकता है.

समान नागरिक संहिता क्यों अहम है?

- समान नागरिक संहिता भारत में हमेशा से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है. संविधान में इसे नीति निदेशक तत्व में शामिल किया गया है.

- संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार का दायित्व है. अनुच्छेद 44 उत्तराधिकार, संपत्ति अधिकार, शादी, तलाक और बच्चे की कस्टडी के बारे में समान कानून की अवधारणा पर आधारित है. 


- समान नागरिक संहिता को सत्ताधारी पार्टी बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में 1998 और 2019 में भी शामिल किया था. नवंबर 2019 में बीजेपी सांसद नारायण लाल पंछारिया ने संसद में इस पर प्रस्ताव दिया था. हालांकि, विपक्षी सांसदों के विरोध के बाद प्रस्ताव को वापस ले लिया गया था.

- दूसरी बार मार्च 2020 में बीजेपी से राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीना इस पर बिल लेकर आए थे. हालांकि, इस बिल को संसद में पेश नहीं किया गया. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में भी इसे लेकर कई याचिकाएं दायर हैं.

- 2018 में विधि आयोग ने अपने कंसल्टेशन पेपर में लिखा था, 'भारत में अलग-अलग पारिवारिक कानूनों में कुछ ऐसी प्रथाएं हैं, जो महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करती हैं, जिनमें सुधार करने की जरूरत है.'

जब अदालतों ने की टिप्पणी

- 1985 में शाहबानो के मामले में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, 'संसद को एक समान नागरिक संहिता की रूपरेखा बनानी चाहिए, क्योंकि ये एक ऐसा साधन है जिससे कानून के समक्ष समान सद्भाव और समानता की सुविधा देता है.'


- 2015 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ईसाई कानून के तहत ईसाई महिलाओं को अपने बच्चे का 'नैचुरल गार्जियन' नहीं माना जा सकता, जबकि अविवाहित हिंदू महिला को बच्चे का 'नैचुरल गार्जियन' माना जाता है. उस समय सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक जरूरत है.

- 2020 में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 में किए गए संशोधन की व्याख्या की थी. अदालत ने ऐतिहासिक फैसले में बेटियों को भी बेटों की तरह पैतृक संपत्ति में समान हिस्सेदार माना था. दरअसल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून,1956 में संशोधन किया गया था. इसके तहत पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबरी का हिस्सा देने की बात कही गई थी.

- 2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी कहा था कि संसद को समान पारिवारिक कानून लाने पर विचार करना चाहिए, ताकि लोग अलग-अलग कानूनी बाधाओं का सामना किए बगैर स्वतंत्र रूप से मिल-जुलकर रह सकें. 


समान नागरिक संहिता मतलब क्या?

- समान नागरिक संहिता यानी सभी धर्मों के लिए एक ही कानून. अभी शादी, तलाक और संपत्तियों से जुड़े सभी धर्मों के अलग-अलग कानून हैं. जैसे- हिंदुओं के लिए हिंदू पर्सनल लॉ. मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ.


- अगस्त 2018 में 21वें विधि आयोग ने अपने कंसल्टेशन पेपर में लिखा था, 'इस बात को ध्यान में रखना होगा कि इससे हमारी विविधता के साथ कोई समझौता न हो और कहीं ये हमारे देश की क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरे का कारण न बन जाए.'

- समान नागरिक संहिता का प्रभावी अर्थ शादी, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और संपत्ति का अधिकार से जुड़े कानूनों को सुव्यवस्थित करना होगा. 21वें विधि आयोग ने कहा था कि इसके लिए देशभर में संस्कृति और धर्म के अलग-अलग पहलुओं पर गौर करने की जरूरत होगी. 

ऐसा करने में क्या-क्या चुनौतियां हैं?

- आजादी के 75 साल में एक समान नागरिक संहिता और पर्सनल लॉ में सुधारों की मांग होती रही है, लेकिन धार्मिक संगठनों और राजनीतिक नेतृत्व में एकराय नहीं बन पाने के कारण ऐसा अब तक नहीं हो सका है. यहां तक कि अभी भी सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हैं.

- मुस्लिम महिलाओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हैं. इनमें इस्लामिक कानून की प्रथाएं- तलाक-ए-बैन (तुरंत तलाक), मुता (कॉन्ट्रैक्ट मैरिज), निकाह हलाला की वैधता को चुनौती दी गई हैं.


- सिखों की शादियां आनंद मैरिज एक्ट 1909 के दायरे में आती हैं. लेकिन इस कानून में तलाक का कोई प्रावधान नहीं है. लिहाजा सिखों में तलाक हिंदू मैरिज एक्ट के तहत होता है.

- अलग-अलग धर्मों में गोद लेने के कानून भी अलग-अलग हैं. उदाहरण के लिए, पारसियों में गोद ली गई बेटी को कोई अधिकार नहीं है, जबकि गोद लिए बेटे को अपने पिता के अंतिम संस्कार का अधिकार है. हालांकि, संपत्ति में दत्तक बेटे का भी अधिकार नहीं होता. 

- यहां तक की नाबालिग बच्चे की गार्जियनशिप और उत्तराधिकार को लेकर भी अलग-अलग धर्मों के अपने कानून हैं. सुप्रीम कोर्ट में मृत पुरुषों और मृत महिलाओं के उत्तराधिकारियों के बीच भेदभाव को दूर करने के लिए हिंदू उत्तराधिकार कानून में बदलाव की मांग को लेकर याचिका दायर है.

- 1985 में विधि आयोग ने 110वीं रिपोर्ट में उत्तराधिकारियों की परिभाषा में बदलाव की सिफारिश की थी. रिपोर्ट में नाजायज बच्चों को भी उत्तराधिकारी बनाने की सिफारिश की गई थी. लेकिन इसका जमकर विरोध हुआ था.


- इसी तरह 174वीं रिपोर्ट में विधि आयोग ने पैतृक संपत्ति में महिलाओं को भी बराबर अधिकार की सिफारिश की थी. इसे लेकर 2005 में हिंदू उत्तराधिकारी कानून में संशोधन भी किया गया था. लेकिन 2020 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही ये साफ हो पाया था कि जिन महिलाओं के पिता की मौत 2005 से पहले हो चुकी है, वो भी पैतृक संपत्ति में बराबर की भागीदार हैं.

- 2018 में विधि आयोग ने एक ही धर्म के भीतर मौजूद अलग-अलग प्रथाओं का भी जिक्र किया था. उदाहरण के लिए, मेघालय में कुछ जनजातियां 'मातृसत्तात्मक' हैं और वहां पैतृक संपत्ति पर सबसे छोटी बेटी का अधिकार है. वहीं, गैरो जनजाति में दामाद अपनी पत्नी के माता-पिता के साथ रहता है. इसी तरह नागा जनजातियों में महिलाओं को अपने समुदाय से बाहर शादी करने और पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं है. 

- इससे पहले 1984 में विधि आयोग ने तलाक के बाद हिंदू महिलाओं के रखरखाव से जुड़े कानून में बदलाव की सिफारिश की थी. 1983 में ईसाई महिलाओं में तलाक के आधारों में बदलाव की सिफारिश भी की थी. इससे भी पहले 1960 में विधि आयोग ने ईसाइयों में शादी और तलाक से जुड़े कानूनों में सुधार की सिफारिश की थी. 

- 1961 में विधि आयोग ने अपनी 18वीं रिपोर्ट में पति या पत्नी में से किसी एक के धर्मांतरण करने पर तलाक का आधार मानने का सुझाव दिया था. इसी तरह 2009 में ये सिफारिश की थी कि अगर कोई व्यक्ति एक से ज्यादा शादी करने के लिए धर्मांतरण करने को अपराध के दायरे में लाया जाए. हालांकि, रिपोर्ट में ये भी कहा था कि कुछ जनजातियों में बहुविवाह या बहुपति की भी अनुमति है जो संविधान के तहत संरक्षित है.

- 2017 में विधि आयोग ने 270वीं रिपोर्ट में शादियों के रजिस्ट्रेशन और शादी की कानूनी उम्र का मुद्दा उठाया था. इसमें कहा था कि बाल विवाह और सहमति से नाबालिग से संबंध बनाना रेप के दायरे में आता है, उसके बावजूद हिंदू कानून में 16 साल की लड़की और 18 साल के लड़के में शादी की इजाजत है, भले ही कानूनी रूप से ये 'शून्य' हो. इसी तरह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिगों की शादी की इजाजत है.

- इसके अलावा, बैंकिंग और टैक्स से जुड़े कानूनों में अविभाजित हिंदू परिवार को एक यूनिट माना गया है, जबकि बाकी धर्मों में ऐसा नहीं है.

क्या समाधान है इसका?

- 2018 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि समान नागरिक संहिता पर कोई आम सहमति नहीं होने के कारण पर्सनल लॉ में ही थोड़े सुधार करने की जरूरत है. 

- आयोग ने कहा था कि इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि पर्सनल लॉ की आड़ में मौलिक अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा है और इसे दूर करने के लिए कानूनों में बदलाव करना चाहिए.

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