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F. I. R

 पूज्य छत्तीसगढ़ सिन्धी पँचायत ने इतिहास रच दिया कोरोनो काल के इस दौर में सक्रिय हो कर समाज हित के कार्य कर रही है छत्तीसगढ़ में  किसी भी समाज ने लगातार 20  zoom की हो ऐसा रिकार्ड नही है । सिन्धी समाज की पूज्य छत्तीसगढ़ सिन्धी पँचायत  ने 20 वी zoom मिटिंग का आयोजन कर ये रिकार्ड बनाया है । रायपुर के पूर्व विधायक प.छः सी. प. के वर्तमान अध्यक्ष श्री श्रीचंद सुंदरानी जी ने कल की मिटिंग में ये जानकारी दी । आयोजित zoom मिटिंग के होस्ट थे सी.ऐ. चेतन तारवानी जी मीटिंग की शुरुआत भारतीय सिन्धी समाज की गौरव नागपुर की सिन्धी गायक श्रीमति  मंजुश्री आसुदानी ने झूलेलाल साँई के भजन से की । आज की मीटिंग के मुख्यवक्ता थे रायपुर की जानी मानी हस्ती एडवोकेट श्री रूपचंद नागदेव जी जो एक मशहूर वकील है ।आज की मीटिंग का विषय था,,,,,,F.I.R,,,,,,,जी से पे नागदेव जी बारीकी से ओर स्पष्टता से जानकारी दी ।एफ आई आर क्या है?

एफ आई आर का मतलब होता है फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट जिसे हिंदी में ‘प्राथमिकी’ भी कहते हैं। किसी अपराधिक घटना की पहली सूचना जो दर्ज किया गया हो या कानून का अवहेलना करने पर थाना में दर्ज की गई प्रथम सूचना को ‘एफआईआर’ कहा जाता है। किसी अपराध के लिखित या मौखिक सूचना के बाद तैयार किया गया प्रपत्र ‘प्राथमिकी’ कहा जाता है। पुलिस द्वारा अपराध की जांच-पड़ताल का पहला कदम प्राथमिकी दर्ज करना है।

एफ आई आर क्या है और क्या करें जब पुलिस F.I.R. ही न ले?

टेलीफोन के माध्यम से भी एफ आई आर किया जा सकता है

कानून के मुताबिक किसी घटना की सूचना पुलिस को टेलीफोन के माध्यम से भी दिया जाए, तो टेलिफोनिक सूचना को भी पुलिस एफआईआर के रूप में ट्रीट करें। लेकिन प्रायोगिक तौर पर न तो टेलिफोनिक सूचना को यह एफआईआर के रूप में देखा जाता है और न ही अपराध से जुड़ी घटनाओं का रपट दर्ज कर जांच किया जाता है।

सामान्यतः लिखित सूचना दिए जाने के बाद ही रिपोर्ट दर्ज किया जाता है। साथ ही साथ, मौखिक और लिखित सूचना प्राप्त होने के बाद मौके पर अपराध से जुड़ी गतिविधियों का सत्यापन और घटनास्थल किस क्षेत्र में आता है, की पुष्टि के बाद ही आमतौर पर प्राथमिकी दर्ज किया जाता है। अब आप जान चुके है की क्या है एफ आई आर.।

क्या हैं कानूनी दांवपेच

नियमों के मुताबिक किसी भी गैर कानूनी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) की रपट किसी भी थाने में दर्ज कराने का प्रावधान है। परंतु ज्यादातर मामले में थाना द्वारा टाल-मटोल की नीति अपनाई जाती है। आवेदक या सूचक को संबंधित थाने में सूचना देने के लिए कहा जाता है। हद तो तब होती है जब सीमा विवाद के मामले में कई बार रिपोर्ट तक दर्ज नहीं किया जाता है। यहां तक कि किसी घटना में घायल को पुलिस सीमा विवाद के कारण हाथ नहीं लगाती। जिसके कारण घायल व्यक्ति की मौत हो जाती है। थाना के ठीक सामने घटना को कारित किए जाने के बावजूद मामला दर्ज नहीं किया जाता है। तर्क के रूप में यह बताया जाता है कि घटनास्थल हमारे क्षेत्राधिकार से बाहर है, संबंधित थाना को सूचित कर कार्रवाई के लिए कहा जाए।

एफ आई आर क्या है और क्या करें जब पुलिस F.I.R. ही न ले?

लेकिन कानून के मुताबिक यह कहा गया है कि आवेदन जमा करने के 24 घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज किया जाए। लेकिन इन सभी कानूनों से इतर भी काम किया जाता है। एफआईआर दर्ज किए जाने के बाद आवेदक को रजिस्टर्ड प्रति भी दिए जाने का प्रावधान है। घटना के 24 घंटे के अंदर एफआइआर दर्ज कर जांच पड़ताल शुरू किया जाता है। इन्हीं 24 घंटे के अंदर दर्ज की गई प्राथमिकी की कॉपी संबंधित न्यायालय को भी सौंपना होता है।

संज्ञेय अपराध के मामले में एफआईआर के तुरंत बाद अभियुक्तों की गिरफ्तारी का प्रावधान

कानून के अनुसार संज्ञेय अपराध के मामले में एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद अभियुक्तों की गिरफ्तारी का प्रावधान भी उल्लिखित है। साथ ही, कई अन्य मामलों में भी जांच के बाद गिरफ्तारी का विकल्प की चर्चा नियमों में किया गया है।

अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम, महिलाओं से बलात्कार के लिए प्रयुक्त धारा 376 और 376 (G) और छेड़छाड़ से संबंधित धारा 354 सहित भारतीय दंड विधि की अन्य धाराओं में भी अभियुक्त की तुरंत गिरफ्तारी संभव है। गिरफ्तारी के संबंध में कानून यह बतलाता है कि गिरफ्तार किए जाने के 24 घंटे के अंदर अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए।

लेकिन पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के समय की इंट्री भी मनमाने तरीके से किया जाता है। इसके पश्चात आरोपियों के न्यायालय से जमानत मांगने पर कोर्ट संबंधित थाना से डायरी की मांग कर सकता है। डायरी के माध्यम से केस से संबंधित पूरी रिपोर्ट कोर्ट को बताया जाता है। फिर कोर्ट आरोपियों की जमानत के मुद्दे पर अपना फैसला सुनाता है।

इन प्रक्रियाओं का एक अहम् हिस्सा सुपरविजन अर्थात थानाध्यक्ष द्वारा लगाए गए धाराएं और उसके मुदालयों (आरोपियों) का सत्यापन किया जाता है। यदि सत्यापन में धारा और आरोपी दोनों का परस्पर संबंध घटना से हो तो केश को सही कर आरोपियों को दोषी बताते हुए न्यायालय को चार्ज शीट के रूप में अंतिम रिपोर्ट पुलिस द्वारा सौंपा जाता है। जिसमें पुलिस द्वारा आरोपियों को दोषी मानते हुए कोर्ट से पीड़ितों के लिए न्याय की मांग भी उल्लिखित होता है। जिसके बाद कोर्ट प्राथमिकी हेतु आवेदन, केश से संबंधित डायरी और सुपर विजन रिपोर्ट पर सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुनाता है।

क्या करें जब पुलिस F.I.R. ही न ले?

ये आपने जान लिया की एफ आई आर क्या है और अब ये बताते हैं की क्या करें जब पुलिस F.I.R. ही न ले? किसी घटना के प्राथमिकी दर्ज करने से यदि थानाध्यक्ष इनकार करता है, तो ऐसे मामलों में पीड़ितों द्वारा वरीय अधिकारियों और न्यायालयों के शरण लिया जाता है। केस के स्वरूप को देख कर वरीय अधिकारी या कोर्ट थानाध्यक्ष को प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश देते हैं। जिसके बाद थानाध्यक्ष द्वारा प्राथमिकी दर्ज किया जाता है।

नियमों के मुताबिक किसी भी अपराध का मामला दर्ज करने का अधिकार केवल थानाध्यक्ष को है। यदि थानाध्यक्ष को ऐसा प्रतीत होता है कि मामला संज्ञेय नहीं है तो ऐसी स्थिति में वरीय अधिकारी और न्यायालय को अपना जांच रिपोर्ट भेजकर प्राथमिकी दर्ज नहीं करने के लिए आश्वस्त कर सकता है। जबकि ऐसा कानून में उल्लिखित नहीं है।

यदि अपराध संज्ञेय नहीं प्रतीत होता है, तो ऐसे मामलों में कार्रवाई कोर्ट के निर्देश पर किए जाने का उल्लेख नियमों में किया गया है। पीड़ित द्वारा पुलिस को दी गई सूचना अगर पर्याप्त नहीं है, तो पुलिस कार्रवाई करने के लिए बाध्य नहीं है। इसके लिए पुलिस को अपने स्टेशन डायरी में मामले के साथ कार्रवाई नहीं करने के कारण को स्पष्ट करना  होगा तथा इसकी सूचना आवेदन किया सूचक को भी देना होगा। मींटिंग के सयोजक थे चेयरमैन श्री रूपेश बबन भोजवानी ,कार्यकारी अध्यक्ष ,CA चेतन तारवानी  जी , जीतू बड़वानी जी ,महासचिव इंद्र कुमार डोडवानी प्रवक्ता दिनेश अठवानी जी । एक खबर

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